तुम मुझे खून दो ,मै तुम्हे आजादी दूंगा।
तुम मुझे खून दो ,मै तुम्हे आजादी दूंगा।इस तरह के क्रांतिकरि नारे लगाने वाले भारत के महान देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस एक ऐसे नेता थे। जिन्होंने हर भारतीय के दिल मै स्वराज की चाह जगा दी। और इनकी लीडरशिप स्किल्स इतनी हैरान कर देने वाली थी ,की इनके चाहने वाले न केवल भारत मै थे बल्कि पूरी दुनिया मै देखने को मिल जाते है। साथ ही सुभाष चंद्र बोस, गाँधी जी के बहुत ही बड़े प्रशंसक थे ,लेकिन उनका स्वतंत्रता पाने का रास्ता गाँधी जी से बिलकुल अलग था।
क्योकि बोस का मानना था,कि आजादी जैसी बड़ी उपलब्धि को अहिंसा के रस्ते पर चलकर नहीं पाया जा सकता। इसके लिए बहुत सी जाने लेनी पड़ेंगी और बहुत से बलिदान भी देने पड़ेंगे और यही वजह है ,कि अगर आज भी आजादी कि बात होती है तो नेताजी का नाम ना आये ऐसा हो ही नहीं सकता।
तो दोस्तों आज के इस ब्लॉग मै हम नेताजी के जीवन को और भी करीब से जानने कि कोशिस करेंगे।
तो दोस्तों इस कहानी कि शुरुआत होती है 23 जेनुअरी 1897 से जब उड़ीसा के कटक मै सुबाष चंद्र बोस का जनम हुआ। उनके पिता का नाम जानकी दाश बोस थ। जोकि पेशे से एक वकील थे ,और उनकी माँ का नाम प्रभावती बोस और इसके अलावा उनके परिवार मे 13 और भाई बहन थे। दोस्तों सुभाष चंद्र बोस शुरू से ही पढ़ाई लिखाई मे दिलचस्बी रखते थे ,और इसी लिए स्कूल के समय से ही सभी टीचर्स के पसंदीदा छात्र थे। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई
प्रोएस्टेणट यूरोपियन स्कूल से पूरी कि और फिर साल 1913 मे मीट्रिक मे सफल होने के बाद से उनका एडमिशन प्रेसीडेंसी कॉलेज मे करवा दिया गया। और सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही विवेकानंद और रामचंद्र के विचारो से काफी प्रभावित थे। और इन्ही महापुरषो के विचारो से प्रभावित होकर बोस को यह लगने लगा कि उनके पढ़ाई लिखाई से ज्यादा देश के हित मे काम करना जरुरी है।
इतनी अच्छी रैंक होने के बावजूद भी उन्होंने ये नौकरी ठुकरा दी। क्योकि उन्हें ब्रिटिश सरकार मे नौकरी करना मंज़ूर नहीं था। और फिर उन्होंने भारतियों के दिल मे आज़ादी की आशा जगाने के लिए उन्होंने एक न्यूज़पेपर प्रकाशित किया जिसका नाम था, स्वराज और इस समय उनके मार्गदर्शक बने उस समय के एक महान नेता चितरंजन दाश जोकि देशभक्ति से जुड़े भड़काऊ भाषण देने के लिए जाने जाते थे।
सरकार पर बढ़ने लगे। और फिर दूसरे विश्व युद्ध मे ब्रिटिश सरकार चाहती थी। की भारत की आर्मी भी उनके समर्थन मे युद्ध लड़े ,लेकिन नेताजी ने इस फैसले का जमकर विरोध किया क्योकि वो नहीं चाहते थे ,कि ब्रिटिश सरकार कि जीत के लिए भारतीय जवान अपनी जान खतरे मे डाले। हलाकि यहाँ पर एक बार फिरसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जेल मे डाल दिया गया लेकिन जेल जाकर भी वह चुप नहीं बैठे और वही पर भूख हड़ताल कि और इसी लिए उन्हें 7 दिन बाद ही जेल से रिहा कर दिया गया।
आज़ादी के लिए ब्रिटिश के दुसमन देश जर्मनी के लिए रवाना हो गए ,और फिर यहाँ पर हिटलर ने उनसे भारत का समर्थन देने का वादा किया। लेकिन जब विश्व युद्ध मे जर्मनी कि हार होने लगी तभ सुभाष चंद्र बोस एक सबमरीन से जापान चले गए और फिर उनके मजबूत इरादों को देखते हुए उस समय जापान के प्रधानमंत्री ने भी भारत के सहयोग करने कि बात कही और फिर जापान के साथ मिलकर नेताजी ने आज़ाद हिन्द फ़ौज कि स्थापना कि जिसे कि लपो INA या फिर इंडियन नेशनल आर्मी के नाम से भी जानते थे।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आजादी दूंगा जैसे भड़कीले मगर उत्शहित करने वाले क्रांतिकारी नारे लगा कर भारतीयों मे ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लड़ने कि इच्छा और भी बढ़ा दी।









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